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Monday, October 22, 2018
बाबा दंडोत बच्चा जय सियाराम : ऋषि वशिष्ठ
Wednesday, June 20, 2018
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानसक सुन्दरकाण्डकें अर्चना भगवान जी मिश्र द्वारा मैथिली भाषा मे रूपांतरण
मैथिली साहित्यक विभिन्न
विधा मे मौलिक लेखनक संग-संग समय-समय पर नव-नव प्रयोग सेहो होइत आबि रहल अछि. एहि बेर
एहने सन किछु प्रयोग केलनि अछि मैथिली गीत आ फिल्म लेखनमे हस्तक्षेप रखनिहार, पेशा
सँ इंजीनियर, मधुबनी जिलान्तर्गत ननौर ग्रामवासी श्री भगवान जी मिश्र एवं पेशा सँ गणित
शिक्षिका आ हुनक सहधर्मिणी श्रीमती अर्चना प्रियदर्शिनी जिनक संयुक्त प्रयास सँ गोस्वामी
तुलसीदास कृत रामचरितमानसक सुन्दरकाण्डकें मैथिली भाषा मे रूपांतरण एवं पोथी रूपमे
प्रकाशित ‘सरल मैथिली सुन्दरकाण्ड’ केर विमोचन दीपक फाउंडेशनक वार्षिकोत्सव समारोह-२०१८
केर अवसर पर भारत सरकारक पूर्व शिक्षामंत्री एवं प्रखर राजनीतिज्ञ श्री मुरली मनोहर
जोशी जीक करकमल सँ दिल्लीक मावलंकर सभागार मे भेल छल.
सभागार मे उपस्थित दर्शक लोकनिक मध्य भेंटस्वरूप ‘सरल मैथिली सुन्दरकाण्ड’ आ संग मे एकर ऑडियो सीडी जेकि सुपरिचित गायक श्री दिलीप दरभंगिया केर स्वर ओ संगीत मे निर्मित अछि निःशुल्क वितरित कएल गेल. उक्त पोथी आ सीडीक एक प्रति हमरहु प्राप्त भेल. पोथिक आवरण पृष्ठ आ भीतरी पन्नाक उत्तम गुणवत्ता बेस आकर्षित करैत अछि आ दीर्घसमय धरि ई पोथी यथास्वरूप सुरक्षित राखल जा सकैछ. दीपक फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित पहिल संस्करणक एहि पोथिक संपादन केने छथि श्री दीपक झा आ संपादन सहयोग श्री कमल मोहन ठाकुर.
साधारणतया हमरा लोकनि सेहो जखन सुन्दरकाण्ड पाठ करैत छी त’ भाव बुझितो कएक ठाम शब्दक अर्थ बुझबा लेल जिज्ञासु होइत छी. रूपांतरणकर्ताक दू शब्द मे लेखकद्वय द्वारा पाठकक सोझा एहि पोथिक संदर्भमे योजना, क्रियान्वन आ प्रकाशनक उद्देश्य सम्बन्धमे जे अनुभव आ उद्गारकें राखल गेल अछि से सहजहि अकानल जा सकैछ. लेखकीय मंतव्यक आधार पर हिनक मानब छनि मैथिलीमे सरल शब्दक उपयोग करैत लिखबाक मूल उद्देश्य जे आध्यात्मिकताक पालन करैत मानवताक उत्थान हेतु मिथिलाक जन-जन धरि अपन मातृभाषामे एकर प्रचार-प्रसार होय.
लेखकीय प्रयास आ गुणवत्ताक बाद आबी पोथिक पाठकीय पक्ष पर. मैथिली भाषाक प्रति नव पीढ़ीमे आबि रहल उदासीनता जतय चिंताजनक स्थिति उत्पन्न करैत अछि ओत्तहि वर्तमान पीढ़ीक साहित्य सृजनमे सक्रियता आ मातृभाषा प्रति अनुराग सुरक्षित भविष्य हेतु सेहो ततबे सकारात्मक परिवेश बनबैत आश्वस्त करैत अछि. अपना जनैत प्रत्येक सृजनधर्मी लोकनि किछु ने किछु नव सन करबाक प्रयत्न मे छथि जाहि सँ भाषा विस्तारमे अपेक्षित सहयोग भेटैत रहौक. जन-जनकें कंठ मे बसल सुन्दरकाण्डकें मैथिली रूपांतरण करबाक पाँछा हिनको लोकनिक इएह उद्देश्य निहित छनि. वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे देखल जाय त’ उक्त पोथी भाषा संरक्षण आ संवर्धन मे एक योगदानक रूपमे अपन उपस्थिति दर्ज करबैत अछि जे कि सरल,सहज आ सर्वबोधगम्यताक संग पाठकक सोझा प्रस्तुत अछि.
८४ पृष्ठक पोथिक अवलोकन केला उत्तर एहिमे अधिकांश ठाम शब्दानुवाद भेटैत अछि मुदा किछु अंशक भावानुवाद सेहो देखना जाइछ. वर्तनी शुद्धताक मामिलामे बहुत बेसी गंभीरता देखना जाइछ तथापि एक बेर पुनर्संशोधित हएब एहि पोथिक अंतिम प्रकाशन पूर्व आवश्यक छल. टंकण आ मुद्रण केर मामिला मे बेस संतोषजनक काज भेल अछि.
रूपांतरण मे अनेको ठाम क्लिष्ठ शब्दकें सहज बनाएब अचंभित करैत अछि. ई लोकनि किछु शब्दक शोध तत्परतापूर्वक कतेको स्रोत सँ केने छथि तकर दृष्टांत निम्न पाँति सँ देखल जा सकैछ :
मूल : ‘ढ़ोल गँवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’
अनुवाद : ‘ढ़ोल गँवार
शुद्र पशु नारी, प्रेम सँ बुझबै के अधिकारी’
‘ताड़ना’ शब्दक अर्थ आम प्रचलन मे ‘पिटबा’ सँ लगाओल जाइत अछि आ से प्रसंगवश मोन पड़ैत अछि मैथिली साहित्य महासभा,दिल्ली द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘मिथिलाक नारी, नहि छथि बेचारी’ केर मंच सँ श्रीमती करुणा झा तुलसीदासक प्रति क्षोभ व्यक्त करैत कहने रहथि जे इएह पाँति ज’ कोनो स्त्री द्वारा लिखल जाइत त’ से होइत ‘ढ़ोल गँवार पुरुष और घोड़ा, जितना पीटो उतना थोड़ा’. हिनक आक्षेप आम प्रचलनक आधार पर छलनि नहि कि मनगढ़ंत वा कोनो पूर्वाग्रह भावक आधार पर.
एहि पोथिक लेखक लोकनि एहि ठाम ताड़ना शब्दक अर्थ ‘बुझाएब’ सँ स्पष्ट करै छथि, एकर मतलब विभिन्न शब्दकोश वा आन-आन संदर्भ सँ मदति लैत एकर प्रयोग केने छथि. कहबाक अभिप्राय जे तुलसीदासक विराट सोचक संदर्भमे गहन अध्ययनक पश्चात एहि ठाम उपरोक्त शब्दक विकल्प रूपमे प्रयोग करबाक पाँछा हिनका लोकनिक शोध सोझा अबैत अछि. अपना जनैत रूपांतरणमे ठाम-ठाम बेस साकांक्ष हेबाक प्रयत्न केने छथि. शब्द चयनक क्रममे कतहु सटीक मुदा कतहु रूपांतरण मे हूसल सेहो छथि. तुकबन्दी हेतु मात्रामे छूट लैत किछु पाँतिकें सहज रूपे प्रस्तुत करब सेहो नीक लगैछ.
तुकबन्दी मे मात्राक ध्यान सावधानीपूर्वक लेलनि अछि मुदा कएक ठाम शब्द लेबामे मैथिली शब्दक विकल्प रहितो मूल शब्दक प्रयोग एकरत्ती अखरैत सन लगैछ, यथा कच्छप केर स्थान पर काछु लेल जा सकैत छल आ एहेन-एहेन कतेको शब्द जे पाठ करबा काल बेर-बेर सोझा अबैत अछि. लेखकक मंतव्य छनि सरल शब्द प्रयोगक प्राथमिकता, तें एहि गप्प दिस ध्यानाकर्षण कराएब उचित सन बुझना गेल. जेनाकि एकर ऑडियो सेहो निकलल अछि त’ संभव अछि जे गेयधर्मिताक पालन हेतु मीटर मे नै आएब बाध्यता सेहो एक तर्क भ’ सकैत अछि. आर बहुत रास नीक-बेजाए तथ्य जे पाठ करबाक क्रममे सोझा आएल जकर किछु जिम्मा अपने लोकनिक सेहो जे ई विलक्षण पोथी मंगाबी,पाठ करी आ लेखकद्वयकें यथोचित प्रतिक्रिया सँ अवगत करबियनि जे अगिला संस्करण धरि आर बेसी निखरिक’ सोझा आबय.
सरल मैथिली रूपांतरित सुन्दरकाण्डक सद्प्रयास देखि कहल जा सकैछ जे स्थायी रूप सँ शहरी परिवेश मे रहितो एहि दम्पतिकें अपन भाषा आ संस्कारक प्रति जे चेतना आ कृतज्ञताक बोध छनि से हिनका लोकनिकें विशेष बनबैत छनि. ई कहबा मे कनेको असोकर्ज नहि जे हिनका लोकनिक ई प्रयास सराहनीय अछि.
पोथिक मोल यथासाध्य नियमित पाठ आ पोथी प्राप्ति हेतु दीपक फाउंडेशन वा लेखक सँ सम्पर्क कएल जा सकैछ.
संकटमोचन हनुमान जीक कृपा दृष्टि सँ हिनका लोकनिक यशोगानक चर्च होइत रहनि ताहि आशा अपेक्षाक संग एक सिनेही पाठक दिससँ हार्दिक मंगलकामना !
Sunday, June 10, 2018
स्वरचित कविता संग्रहक पोथी 'नीक-बेजाए' पर भेटल प्रतिक्रया
फेसबुकक माध्यम स’ हमर प्रकाशित पोथी “नीक-बेजाए” के संदर्भमे जे समीक्षा आ प्रतिक्रिया भेटल से समेटक’ एत’ एक्के ठाम प्रस्तुत क’ रहल छी. अपनेंक प्रतिक्रिया आ समीक्षा हमर बलबुद्धिकें पुष्ट रखबामे सहयोग करैइयै.एहि उपकृत नेह हेतु अपनें लोकनिक सहृदय आभार.
(पाठकक सहूलियतकें धेआनमे रखैत अंग्रेजी बला अंशकें लिप्यांतर क’ देवनागरीमे क’ देल गेल अछि)
मनीष झा “बौआभाइ”
27 मार्च, 2015/आदित्य भूषण मिश्रक फेसबुक देबालस’ :
'सरगम' स' बोहनि करैत संग्रह 'बसंत'क बाद आचरण पर अबैत अछि। आचरण शीर्षक में बौआभाई जीवन के सारगर्भित आ सम्यक बनेबाक लुतुक लगबैत छथि जे ठीके अनुकरणीय लगैत अछि। ठीक तुरत बाद मिथिलाक पताका फहरबैत मिथिलाक मान-मर्यादाक गुणगान बेस सहज आ ह्रदयस्पर्शी शब्दक माध्यम स' करैत छथि। एही कविताक अंत में शुभेक्षा प्रेषित करैत सब के संगोर करैत आगू बढ़वाक कामना नीक लगैत छैक। समाजक प्रेरणा, माय, माय-बाप के बखरा, आबो चेत, शीर्षक कविता में सूक्ष्म मानवीय संवेदना छलकैत अछि जे 'भाई' के सह्रदय हेबाक सहजे प्रमाण देत अछि। अंग्रेजीक एकटा नमहर कवि एलिन गिन्सबर्ग कहैत छथिन जे कविता ओकरे नीक भ' सकैत अछि जे की अपने नीक व्यक्तित्वक मालिक हो। ई बात सहजहिं बौआभाई पर लागु होइत अछि। कुमार भैंसुर, अफरल पेट,चाही हमरा ढौआ,मधुरगर टोन, क्रमशः निजी जीवनक अनुभव आ दहेज स' झमारल स्थितिक गप्प चोटगर रुपे सोझाँ अनैत अछि। संग्रह में जे हमरा सब स' बेसी नीक लगैत अछि कविता ओ थिक "पाहून ठाढ़ दलान पर"। बेजोड़ लगैत अछि ई आ बेर-बेर पढ़वा लेल बाध्य करैत अछि। भेल एहन अवतार छल, दुन्नु बापुत,नीक-बेजाए,अप्पन-आन,नेताजीकें हाल,केदैन पुछैयै,सत्ताकें शिकार, कविताक सब में व्यंगात्मक शैली में कुव्यवस्था पर सोझेसोझ प्रहार करैत छथि। हम ऋणी छि आ पढ़' खातिर में अप्पन ककहरा गुरुजन आ पिताक प्रति आभार व्यक्त करब कविक आभारी ह्रदय के परिचायक लगैत अछि। आई जखन की नेन्ना सब एक्को साल नहीं मोन रखैत छथि अप्पना गुरुजन के ताहि समय में अप्पन आदिगुरु सबहक प्रति आभारी रहब बेस नीक लगैत छैक। छी मानव अलबत्ते हम, समयक अश्रुपात, श्रधांजलिक बाटे कखन संग्रह शेष भ' जाइत अछि बुझेबे नहीं करैत अछि। एकटा नीक आ सत्यानुभव आधारित संग्रह लिखिबाक लेल 'बौआभाई' के बहुत बहुत धन्यवाद् आ शुभकामना।
एकटा बात जे हमरा बुझ' में नहीं अबैत अछि जे कवि अप्पन परिचय में विवाहक कुंडली कियैक द' दैत छथिन आ एही कुंडली-सम्प्रेषण के शिकार बौआभाई के संग्रह सेहो भेल छनि।
औखन ऐतबहि।
अहाँके कवि-परिचयक जे अंश अखरल तकर अन्देशा हमरा अपनों छल मुदा ई गप्प अहाँ छोड़ि आइ धरि केओ नैं कहला वा नैं लिखला तैं अपनेकें पुनः साधुवाद ! देखाओंसक त्रुटि कही वा हमर अप्पन तर्क कही वा एकरा सार्वजनिक रूपे हमर अपरिपक्वता मानल जाए......खैर, जे ! से ! आगाँ स’ एहिमे सुधारात्मक प्रयास सेहो हएत ततबा आश्वस्त करै छी.
एक नीक मित्र आ शुभचिंतकक दृष्टिकोणे अपनेंक लिखल एक-एक आखर हमरा नीक लागल मने बेजाए अंश सेहो नीक लागल कारण एहि सभस’ ज्ञानबोध होइ छै जेकि ककरो स’ भ’ सकै छै ताहिमे अहाँ हमर हृदय जीतल. एक बेर पुनः धन्यवाद ! साधुवाद ! आभार ! मंगलकामना !






